राजयोग निष्ठुर नियति के क्रूर विधान ने राधेरानी के हॅसते खेलते वार्धक्य जीवन में ऐसा विष घोला की बेचारी , इस भरी दुनिया में अपने इकलौते निकम्मे पुत्र के साथ अकेली रह गयी थी , राधेरानी की ऑखों में पुत्र के प्रति स्नेह था , परन्तु नौकरी छोड कर आने की नाराजगी भी थी । स्वर्गीय पति के जीवन काल की एक एक घटनायें किसी चलचित्र की भॉति मानस पटल पर घूमने लगी , मंत्री जी तो मंत्री जी थे , राजसी ठाट बाट के धनी , उच्च राजपूत कूलीन धनाढ्य , परिवार में जन्मे ...
साहित्य उन्माद मेरे हिन्दी साहित्य रचनाओं का एक संगृह है




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