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गर्मी जिसे तपा दे

 गर्मी जिसे तपा दे ,

ठंड जिसे कपा दे।

जो हर मौसम मे दुःख ,

झेलने का आदि है ,

इस भूतल पर संर्घषरत

कर्मयोगी वह मानव जाती है ।

. कृष्णभूषण सिंह चन्देल

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राजयोग (कहानी) डॉ0कृष्‍ण भूषण सिंह चन्‍देल

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उन्हें कांधे पर उठा कर

उन्हें कांधे पर उठा कर ,  हम से दो गज भी चला न गया,  जिनके कांधों पर बचपन बीता ,  सब को सम्हालतें सम्हालतें,  जो दुनिया से रुक़सद हो गया   उनका अंतिम बोझ भी ,  हमसे उठाया न गया  उन्हें कांधे पर उठा कर ,  हम से दो गज भी चला न गया  जिसने जीवन भर कुछ ना माँगा ,  प्राणरहित देह निःशब्द अग्निदाह तक बेटे के कांधें का अपना अधिकार मांग रहा है ।  उन्हें कांधे पर उठा कर ,  हमसे दो गज भी चला न गया,  जिसने जीवन भर दिया , कभी हाथ ना फैलाया ,  वही आज भिक्षुक बन ,  अपना अधिकार मांग रहा है ।  उन्हें कांधे पर उठा कर ,  हमसे दो गज भी चला न गया ।  जन्मदाता के ऋण से बडा ,  पालपोस के पैरों पर खडें होने का ,  जिसने कभी अहसान न जताया ,  वह आज बस अग्नि दाह तक ही तो  अपना अधिकार माँग रहा ।  उन्हें कांधे पर उठा कर ,  पर हम से दो गज भी चला न गया,  डाँ. कृष्णभूषण सिंह चन्देल

कलाकार -लधु कथा-

                                कलाकार        उस मायवी कलाकर के सुदृण सधें हाथों ने बेज़ान मिट्टी की मूर्तियों में जैसे जान फू़क दी थी ,ऐसा लगता था कि बेजान मूर्तियॉ चंद क्षणों में बोल उठेगी , कलाकार की इस अद्वितिय कलाकृतियों में एक कलाकृति ऐसी अनिंद्य सुन्‍दर यौवना की थी , जो शायद विधाता के संजीव रचना की कमियों को भी पूरी कर अपने अनुपम रूप लावण्‍य से इतरा कर मानों कह रही हो, देखों मै बेज़ान मिटटी की मूर्ति हूं , परन्‍तु तुम जीवित सुन्‍दरियों से भी अधिक सुन्‍दर हूं , देखो मेरे रूप लावण्‍य को , देखों मेरी देह आकृति के उतार चढावों को मुक्षमें कमी कहॉ है ?   सचमुच मिट्टी की आदमकद इस रूपसी के यौवन के देह आकृति को देख खजुराहों व कोर्णाक की सहज याद हो आती थी । गहरी झींल सी ऑखें मस्‍ती भरी देह आकार पुष्‍ट नितम्‍ब ,उन्‍नत स्‍वस्‍थ्‍य उरोज ,मिट्टी से बने अधोवस्‍त्रों की व्‍याख्‍या करने का दु:साहस शायद मुक...