दद्दा बऊ की सुने ने भईया, साकें (शौक) को मरे जा रये । अँगुरियों में सिगरट दबाये , और मों (मुँह) में गुटका खाँ रये । निपकत सो पेंट पेर रये , सबरई निकरत जा रये । दद्दा बऊ की सुने ने भईया, साकें (शौक) को मरे जा रये । फटो सो पतलून पेर रये , अंग अंग दिखा रये । अच्छी बात करो तो भईया, हमई को आँखें दिखा रये । दद्दा बऊ की सुने ने भईया साकें (शौक) को मरे जा रये । खब्बीसा सी कटिंग कराये , जोंकरों सी सकल बना रये । लुगईयों से बाल रखायें, कानों में बाली पेर रये बाई चारी जींस और स्कीन टच उन्ना पेर रई लाज शर्म तो बची नईया, सडकों पे गर्रा रई । ऐसे ऐसे गाना चले हे , समक्षई मे नई आ रये । दद्दा बऊ की सुने ने भईया साकें (शौक) को मरे जा रये । कृष्णभूषण सिंह चन्देल M.9926436304
राजयोग निष्ठुर नियति के क्रूर विधान ने राधेरानी के हॅसते खेलते वार्धक्य जीवन में ऐसा विष घोला की बेचारी , इस भरी दुनिया में अपने इकलौते निकम्मे पुत्र के साथ अकेली रह गयी थी , राधेरानी की ऑखों में पुत्र के प्रति स्नेह था , परन्तु नौकरी छोड कर आने की नाराजगी भी थी । स्वर्गीय पति के जीवन काल की एक एक घटनायें किसी चलचित्र की भॉति मानस पटल पर घूमने लगी , मंत्री जी तो मंत्री जी थे , राजसी ठाट बाट के धनी , उच्च राजपूत कूलीन धनाढ्य , परिवार में जन्मे ...
कलाकार उस मायवी कलाकर के सुदृण सधें हाथों ने बेज़ान मिट्टी की मूर्तियों में जैसे जान फू़क दी थी ,ऐसा लगता था कि बेजान मूर्तियॉ चंद क्षणों में बोल उठेगी , कलाकार की इस अद्वितिय कलाकृतियों में एक कलाकृति ऐसी अनिंद्य सुन्दर यौवना की थी , जो शायद विधाता के संजीव रचना की कमियों को भी पूरी कर अपने अनुपम रूप लावण्य से इतरा कर मानों कह रही हो, देखों मै बेज़ान मिटटी की मूर्ति हूं , परन्तु तुम जीवित सुन्दरियों से भी अधिक सुन्दर हूं , देखो मेरे रूप लावण्य को , देखों मेरी देह आकृति के उतार चढावों को मुक्षमें कमी कहॉ है ? सचमुच मिट्टी की आदमकद इस रूपसी के यौवन के देह आकृति को देख खजुराहों व कोर्णाक की सहज याद हो आती थी । गहरी झींल सी ऑखें मस्ती भरी देह आकार पुष्ट नितम्ब ,उन्नत स्वस्थ्य उरोज ,मिट्टी से बने अधोवस्त्रों की व्याख्या करने का दु:साहस शायद मुक...
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