अंधेरे तुम अपनी काली चादर ,
कितनी भी फैला दो ।
हम इंसान है ,
हर सितम से वाकिफ़ है ।
आज नही तो कल ,
मंझिल ढूढ ही लेगे ।
अंधेरे तब तेरा क्या होगा ।
रोशनी तो हमे रास्ता दिखला ही देगी ,
अंधेरे तुझें ,कौन राह बतलायेगा ।।
डाँ. कृष्णभूषण सिंह चन्देल
डाँ. कृष्णभूषण सिंह चन्देल
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