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बीत गये है सोलह सावन

 

  बीत गये है, सोलह सावन।

परहूं तुम न आये सजनवा ।।

बिरहा की आग में।

जले रे ,मोरा मनवा ।।

पीर न जाने काऊ ।

  बीत गये है ,सोलह सावन।

परहूं तुम न आये सजनवा ।।

सखी सहेली ताना मारे ।

पुरवाई देत उल्‍हाना ।।

सांझ बेला , सब के नैना ।

देखत मोरे अंगनवा ।।

  बीत गये है , सोलह सावन।

परहूं तुम न आये सजनवा ।।

अमुआ पे बैठी काली कोयलीयॉ ,

कूंक कूंक के पूछे मोरी विथा ।

साजनी तोरे साजन की ,आई कोऊ खबरीयाँ ।।

  बीत गये है, सोलह सावन।

परहूं तुम न आये सजनवा ।।

सांझ बेला मोरे अगनवा,

रोज देखे बैरी चदनवा,

काहे नही आये तुम सजनवा ।

  बीत गये है सोलह सावन।

परहूं तुम न आये सजनवा ।।

भेजत काहे नाही कोऊ खबरिया,

मोरे बाबुल भये मोरे दुश्‍मन,

ममता ने आंसु सुखोयें ,

सब जग बैरी भओं सजनवा,

  बीत गये है, सोलह सावन।

परहूं तुम न आये सजनवा ।।

चहुं ओर मोरे लाज के पहरें

काहे न समक्षे, जग मोरी पीडा,

मै बाबरी तोरे प्‍यार में पागल,

और तू बैरी न समझे मोरी पीडा ।

  बीत गये है सोलह सावन,

परहूं तुम न आये सजनवा ।।

जबहुं देखू मै दपर्ण को,

सूनी दिखत है, मोरी मॉग,

सूनों सूनों लागे , जग सारो,

कैसे बैरी भये सजनवा ।

 काहे नही समझत विरहन का र्दद ,

  बीत गये है, सोलह सावन।

परहूं तुम न आये सजनवा ।।

डाँ. कृष्णभूषण सिंह चन्देल

मो. 9926436304

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