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हम जिन्दगी के उस मुक़ाम पर खडे है

 हम जि़न्दगी के उस मुक़ाम पर खडें है 

जहाँ कब जिन्दगी की शाम हो जाये ।

कोई भरोसा नही , कोई भरोसा नही ।

अब आगे चल नही सकता ,

पीछे मुड नही सकता ।

जीवन संगिनी चली जीवन पथ पर ,

अंत समय तक साथ निभाने,

दुःख सुख मे साथ निभाने की जिसने कसमे खाई ,

वही सब भूल कर बच्चे बहू नाती नातन मे खो गई ।

हम जिन्दगी के उस मुक़ाम पर खडे है ,

जहाँ कब जिन्दगी की शाम हो जाये ।

कोई भरोसा नही , कोई भरोसा नही ।

बुढ्ढे को अलग कमरे मे रहने को मजबूर किया ,

मै अकेला तन्हा तडफता रहा,

सब कुछ होते हुऐ भी मै अकेला रहा ।

कहने को सब है , मगर कुछ नही ,

अकेला और कब तक चलू ,

जीवन रुकता नही ,शाम होती नही

हम जिन्दगी के उस मुक़ाम पर खडे है ,

जहाँ कब जिन्दगी की शाम हो जाये ।

कोई भरोसा नही , कोई भरोसा नही ।

जिन्दगी बोक्ष हो गई , रात दिन कटते नही,

उम्मीदों  की सुबहा नही, शाम की आंस नही ,

जब जवानी थी जब कमाता था ।

सब की आँखों का तारा था ।

अब बेकार हूँ बेबस हूँ लाचार हूँ ,

हम जिन्दगी के उस मुक़ाम पर खडे है 

जहाँ कब जिन्दगी की शाम हो जाये ।

कोई भरोसा नही , कोई भरोसा नही ।

कृष्णभूषण सिंह चन्देल

M 9926436304


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