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सितंबर, 2022 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

ज़िंदा हूँ इस तरह कि ग़म-ए-ज़िन्दगी नहीं

  ज़िंदा हूँ इस तरह - Zinda Hoon Is Tarah (Mukesh, Aag) Movie/Album: आग (1948) Music By: राम गांगुली Lyrics By: बहज़ाद लखनवी Performed By: मुकेश ज़िंदा हूँ इस तरह कि ग़म-ए-ज़िन्दगी नहीं जलता हुआ दीया हूँ मगर रोशनी नहीं ज़िंदा हूँ इस तरह... वो मुद्दतें हुईं हैं किसी से जुदा हुए लेकिन ये दिल की आग अभी तक बुझी नहीं ज़िंदा हूँ इस तरह... आने को आ चुका था किनारा भी सामने ख़ुद उसके पास ही मेरी नैया गई नहीं ज़िन्दा हूँ इस तरह... होंठों के पास आए हँसी, क्या मजाल है दिल का मुआमला है कोई दिल्लगी नहीं ज़िन्दा हूँ इस तरह... ये चाँद ये हवा ये फ़ज़ा, सब हैं माज़मा जब तू नहीं तो इन में कोई दिलकशी नहीं ज़िन्दा हूँ इस तरह... Labels:  1940s  ,  1948  ,  Aag  ,  Behzad Lakhnavi  ,

ये दिल और उनकी, निगाहों के साये

  ये दिल और उनकी, निगाहों के साये - (३) फिल्म प्रेम पर्वत 1973 गीतकार ज़ा निसार अख़्तर मुझे घेर लेते, हैं बाहों के साये - (२) पहाड़ों को चंचल, किरन चूमती है - (२) हवा हर नदी का बदन चूमती है - (२) यहाँ से वहाँ तक, हैं चाहों के साये - (२) ये दिल और उनकी निगाहों के साये ... लिपटते ये पेड़ों से, बादल घनेरे - (२) ये पल पल उजाले, ये पल पल अंधेरे - (२) बहुत ठंडे ठंडे, हैं राहों के साये - (२) ये दिल और उनकी निगाहों के साये ... धड़कते हैं दिल कितनी, आज़ादियों से - (२) बहुत मिलते जुलते, हैं इन वादियों से - (२) मुहब्बत की रंगीं पनाहों के साये - (२) ये दिल और उनकी निगाहों के साये ...

ऐ जि़न्दगी ले चल मुझे वहाँ

 ऐ जि़न्दगी ले चल मुझे वहाँ  जहाँ नफरतों की दिवारे न हो  इंसान का इंसान से इंसानियत का नाता हो हर सुबह मस्जिद मे आज़ान हो चर्चो में धंटों की आवाज  , मंदिर मे शंख नांद हो गुरुद्वारे गुरू वाणी हो ।  ऐ जि़न्दगी ले चल मुझे वहाँ  जहाँ नफरतों की दिवारे न हो  जहाँ हर दिलों मे इंंसानियत के ज़ज्बे आम हो । जहाँ हर मज़हप की  शान में श्रृद्दा से सर क्षुकते हो ।  ऐ जि़न्दगी ले चल मुझे वहाँ  जहाँ नफरतों की दिवारे न हो  जहाँ अमन चैन की बाते हो जहाँ इंसान इंंसानियत के खून का प्यासा न हो जहाँ इंसानी व़ासिन्दों की नफ़रती तासीर ना हो  ऐ जि़न्दगी ले चल मुझे वहाँ, जहाँ नफरतों की दिवारे न हो  जहाँ हर इंसानों की प्यास बुक्षाये बहती ऐसी गंगा धारा हो । जहाँ हिंदू ,मुस्लिम ,सिख, इसाई गंगा जमनी तहज़ीब की पहचान हो ।  ऐ जि़न्दगी ले चल मुझे वहाँ  जहाँ नफरतों की दिवारे न हो । सारे जहाँ मे हम अमन चैन की एक मिसाल हो   जहाँ मुल्क के हर बासिन्दों के सर देश की शान मे कटने को तैयार हो । जहाँ राम की रामायण हो प्रभु इशू की पवित्र बाईबल हो  अ...

बेखौप जिन्दगी चलती रही ।

बेखौप जिन्दगी चलती रही । कभी खुशी,कभी गम की राहो में ।। कभी ठन्ड ने कपाया,कभी गर्मी ने झुलसाया । कितने सावन भादों ,आये चले गये इन राहों में ।। बेखौप जिन्दगी चलती रही । कभी खुशी,कभी गम की राहों में ।। कभी अपने ,कभी पराये । मिलते बिछडते रहे इन राहों मे ।। मै जिन्दगी का आखरी म़ुकाम ढूढता रहा । मललब परस्त, बेरहम इंसानों में ।। बेखौप जिन्दगी चलती रही । कभी खुशी,कभी गम की राहो में ।। आदमी को आदमी न समक्षने वाले । बेलगाम, गुमनाम बस्तीयों मे । मै भूल चुका था, इस मतलपरस्त दुनियां मे ।। मै अकेला आया हूँ ,मुक्षे अकेल जाना है । न मै अपनी मर्जी से यहाँ आया, न अपनी मर्जी से जाना है ।। बेखौप जिन्दगी चलती रही । कभी खुशी,कभी गम की राहो में ।। मै भूल गया जिन्दगी की ज़ुस्तज़ू में, मिट जायेगा जिस्म एक दिन । मेरे अपने ही मुक्षे  सुपूर्द ए ख़ाक कर , वापिस लौट जायेगें अपनी दुनियां मे ।। बेखौप जिन्दगी चलती रही । कभी खुशी,कभी गम की राहो में ।। डाँ. कृष्णभूषण सिंह चन्देल मो.9926436304

बरस बरस को, आज पावनी आयो है त्‍यौहार

  कृष्‍ण -       बरस बरस को , आज पावनी,आयो है त्‍यौहार ।          हमे खेलन दे फॉग गुलाल ।।          रंगी री धरती , रंगो आकाश , रंगो आज सारो संसार ।           हमे खेलन दे फॉग गुलाल ।। राधा-    हम न खेलब , होरी हो तुम संग ,          ऐ गिरधर गोपाल , हमका जाये दे रे नन्‍द लाल । कृष्‍ण    -काहे रिसानी ओ राधे रानी ,         बरस बरस को त्‍यौहार ,       खेलों हमसे फाग गुलाल । राधा-    पतली चुनरीयॉ , मोरी बाली उमरियाँ       तोहें ,काहे लाज शरम न आये ,      हमका जाये दे रे नन्‍द लाल ।   कृष्‍ण – लाज की मारी, ओ राधे रानी,       आज नही कछु लाज ।        हमका खेले दे फाग गुलाल ।     देखो कैसो मगन भयो ह...

बीत गये है सोलह सावन

    बीत गये है, सोलह सावन। परहूं तुम न आये सजनवा ।। बिरहा की आग में। जले रे ,मोरा मनवा ।। पीर न जाने काऊ ।   बीत गये है ,सोलह सावन। परहूं तुम न आये सजनवा ।। सखी सहेली ताना मारे । पुरवाई देत उल्‍हाना ।। सांझ बेला , सब के नैना । देखत मोरे अंगनवा ।।   बीत गये है , सोलह सावन। परहूं तुम न आये सजनवा ।। अमुआ पे बैठी काली कोयलीयॉ , कूंक कूंक के पूछे मोरी विथा । साजनी तोरे साजन की ,आई कोऊ खबरीयाँ ।।   बीत गये है, सोलह सावन। परहूं तुम न आये सजनवा ।। सांझ बेला मोरे अगनवा, रोज देखे बैरी चदनवा, काहे नही आये तुम सजनवा ।   बीत गये है सोलह सावन। परहूं तुम न आये सजनवा ।। भेजत काहे नाही कोऊ खबरिया, मोरे बाबुल भये मोरे दुश्‍मन, ममता ने आंसु सुखोयें , सब जग बैरी भओं सजनवा,   बीत गये है, सोलह सावन। परहूं तुम न आये सजनवा ।। चहुं ओर मोरे लाज के पहरें काहे न समक्षे, जग मोरी पीडा, मै बाबरी तोरे प्‍यार में पागल, और तू बैरी न समझे मोरी पीडा ।   बीत गये है सोलह सावन, परहूं तुम न आये सजनवा ।। जबहुं देखू मै ...