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संदेश

उन्हें कांधे पर उठा कर

उन्हें कांधे पर उठा कर ,  हम से दो गज भी चला न गया,  जिनके कांधों पर बचपन बीता ,  सब को सम्हालतें सम्हालतें,  जो दुनिया से रुक़सद हो गया उसका अंतिम बोझ भी ,  मुझसे कंधों पर उठाया न गया उन्हें कांधे पर उठा कर ,  हम से दो गज भी चला न गया जिसने जीवन भर कुछ ना माँगा ,  प्राणरहित देह निःशब्द अग्निदाह तक कांधें का अपना अधिकार मांग रहा है ।  उन्हें कांधे पर उठा कर ,  हमसे दो गज भी चला न गया,  जिसने जीवन भर दिया , कभी हाथ ना फैलाया ,  वही आज भिक्षुक बन ,  अपना अधिकार मांग रहा है । उन्हें कांधे पर उठा कर ,  हमसे दो गज भी चला न गया ।  जन्मदाता के ऋण से बडा ,  पालपोस के पैरों पर खडें होने का ,  जिसने कभी अहसान न जताया ,  वह आज बस अग्नि दाह तक ही तो अपना अधिकार माँग रहा ।  उन्हें कांधे पर उठा कर , हम से दो गज भी चला न गया,  डाँ. कृष्णभूषण सिंह चन्देल

गोविंद भैया सो पी बे बारों ,

 गोविंद भैया सो पी बे बारों , अब कोनऊ नई, दिखा रओं । ने शेर सो दहाड बे बारो , प्रदीप कियांऊ दिखा रये । गर्ग भैया सो भग बे बारों, अब कोनऊ नई आ रऔं । पाठक जी तो बिलकुलई चिमा गये । जाटव सो दिखातई नईया, ने गोविंद की आँखें फोडबें बारों, वर्मा कियांऊ दिखा रऔं । सरकारी गाडी  उल्टाबें बारो , मिश्रा  तो अब दिखातई नईया । धुरा बारें महराज ,भूले भटके आ रये । महिला प्रेमी बेनी भाई साहब , घरई में घर वाली की खोपडी खा रये । कुवरमन के खाना को डब्बा , अब संगे नई जा रऔं , कुंवर सहाब को गोस माँस , बनाबे बारों कोनऊँ नई दिखा रऔं, पशु विभाग में अब बा रोनक बची नईयाँ । सबरे निपटत जा रयें गर्राबें बारें अब बचे नईयाँ, एक शशीकांत सो दिखा रऔं । नेतागिरी करबें बारे, पाण्डेय, पटेल  से ,अब नई आ रये । कन्छेदी सो चौकीदार अब ढूँढे नई मिल रऔं  के एस चन्देल

गुन गुन करती आई चिरईयॉ

  गुन गुन करती आई चिरईयॉ, कें बें कों शरमा रई । भीडतंत्र कों जमानों है, भईयाँ बहुमत को हे राज । लूट घसोंट (खरीद फरोक्‍त) कर सरकारें बन रई , जनता ठगी लूटी जा रई , अ, ब, स, को ज्ञान नईयॉ, सरकार, उनकों शिक्षा मंत्री बना रई । पाई पाई को जो हिसाब ने जानें , वो वित्‍त मंत्री कहला रओं । गुन गुन करती आई चिरईयॉ, कें बें  को शर्मा रई । गोली, डण्‍डों की सरकारें , भ्रष्टाचार फैला रई । बोट बैंक के लानें जा तो , का का खेल रचा रई । कोऊ बाटें लैपटॉप, तो कोनऊ साईकल चलवा रओं , धनीराम पाई पाई (धन ) को ललचाबें, जें पैसों के ढेर लगा रये , घर में नईयॉ खाँबें को , जें मुफ्त में राशन बटवा रई । करबें खाँबें बारे ,सबरों को , जें हरामखोंर बना रई । गुन गुन करती आई चिरईयॉ , कें बें को शरमा रई, चोरी करें और डाकों डारे , बेंई संत महात्‍मा कहला रये । कोनऊॅ बन बैठों संत महात्‍मा , तो कोनऊॅ कथावाचक कहला रओं । कोनऊ कें बें कृपा बरसेगी, कोनऊ आर्शीवाद हें के रओं । कोनऊॅ जेल में पिडों रो रओं , कोनऊ देश छोड भग जा रओं । संतों की माया देख चिंरईयाँ , ...

ऐसी ऐसी फिल्‍में चली हें भईया

  ऐंसी ऐंसी फिल्‍में चली हें भईया, कछु समझई में नई आ रई । अब ने वो सेठी गंजा दिखाबें , ने कियाऊ कोनऊ मुकेश, रफी सो गा रओं । ने फिल्‍मों में अब, हॅसाबें बारों , मुकरी , महमूद सो दिखा रओं । बाल कलाकार की छुट्टी हो गई, अब फैशन बारी आ रई । ऐसी ऐसी फिल्‍में चली हें भईया, कछु समझई में नई आ रई । देव , राज , और दिलीप कुमार सो , ऐक्टिंग करबें बारों कोनऊ नई दिखा रओं। ऑखें धुमाबें बारो के एन सिंग, ने मों (मुँह) में दबाये सिंगार बारों , कोनऊ नही   दिखा रओं, ने तो जानी के बे बारों , राजकुमार सो कोनऊ आ रओं पुष्‍पा के हाथ हिलाबे, ऐसी ऐक्टिंग बारो ढुंढे नई मिल रओं दिलीप कुमार की नकल करबें सबरे मरे मरे जा रये । मनोज कुमार सी देश भक्‍ती की , फिल्‍में अब नई आ रई । शहंशाहों के रोल में भईया, कोनऊ पृथ्‍वीराज ने प्रदीप सो दिखा रओं । ऐसी ऐसी फिल्‍में चली हें भईया, कछु समझई में नई आ रई । ने बढती का नाम दाडी, ने चलती का नाम गाडी, ऐसी अब कोनऊ फिल्‍में नई बना रओं । ने कोनऊ फिल्‍मों में बिरजू सी,   शैतानी करबे बारों नजर आ रओं । खामोश के...

हम जिन्दगी के उस मुक़ाम पर खडे है

  हम जि़न्दगी के उस मुक़ाम पर खडें है  जहाँ कब जिन्दगी की शाम हो जाये । कोई भरोसा नही , कोई भरोसा नही । अब आगे चल नही सकता , पीछे मुड नही सकता । जीवन संगिनी चली जीवन पथ पर , अंत समय तक साथ निभाने, दुःख सुख मे साथ निभाने की जिसने कसमे खाई , वही सब भूल कर बच्चे बहू नाती नातन मे खो गई । हम जिन्दगी के उस मुक़ाम पर खडे है , जहाँ कब जिन्दगी की शाम हो जाये । कोई भरोसा नही , कोई भरोसा नही । बुढ्ढे को अलग कमरे मे रहने को मजबूर किया , मै अकेला तन्हा तडफता रहा, सब कुछ होते हुऐ भी मै अकेला रहा । कहने को सब है , मगर कुछ नही , अकेला और कब तक चलू , जीवन रुकता नही ,शाम होती नही हम जिन्दगी के उस मुक़ाम पर खडे है , जहाँ कब जिन्दगी की शाम हो जाये । कोई भरोसा नही , कोई भरोसा नही । जिन्दगी बोक्ष हो गई , रात दिन कटते नही, उम्मीदों  की सुबहा नही, शाम की आंस नही , जब जवानी थी जब कमाता था । सब की आँखों का तारा था । अब बेकार हूँ बेबस हूँ लाचार हूँ , हम जिन्दगी के उस मुक़ाम पर खडे है  जहाँ कब जिन्दगी की शाम हो जाये । कोई भरोसा नही , कोई भरोसा नही । कृष्णभूषण सिंह चन्देल M 9926436304

देखते देखते जिन्दगी क्या हो गई

  देखते देखते जिन्दगी क्या हो गई  मुंह पुपला गया , दाँत क्षड गये , कमर झुंक कमानी हो गई । चलना भी अब दुस्वार हो गया , देखते देखते जिन्दगी क्या हो गई । कभी कलशों से नहाया , लोटों की तरह । अब जिन्दगी बोंझ हो गई । चेहरा पोपला गया ,बाल क्षड गये , कमर क्षुक कमानी हो गई , कभी पढा था , आदमी की सफलता में औरत का हाथ होता है ।  इस रहस्य को समझतें समझतें मै बूढा हो गया , तब समझ में आया , इस कामयाबी मे बूढे बाप की जावनी , उसके खून पसीने की महनत है । लोग तो बडी सहजता से कह देते है । आदमी की कामयाबी मे औंरत का हाथ होता है , अब उन्हे कौन समक्षायें । दिल बहलाने को ख्याल अच्छा है। जवानी छिन चुकी ,जिंदगी बोझ लगने लगी । अब और कुछ कह कर ,  मुझे अपना हुक्का पानी ,थोडी बन्द कराना है । जिस हाल में हूँ , जींना तो अब मजबूरी है । चल रही है गाडी भरोसे भगवान के , देखते देखते जिन्दगी क्या हो गई । कृष्णभूषण सिंह चन्देल M 9926436304

दद्दा बऊ की सुने ने भईया साकें (शौक) को मरे जा रये ।

 दद्दा बऊ की सुने ने भईया, साकें (शौक) को मरे जा रये । अँगुरियों में सिगरट दबाये , और मों (मुँह) में गुटका खाँ रये । निपकत सो पेंट पेर रये , सबरई निकरत जा रये । दद्दा बऊ की सुने ने भईया, साकें (शौक) को मरे जा रये । फटो सो पतलून पेर रये , अंग अंग दिखा रये । अच्छी बात करो तो भईया, हमई को आँखें दिखा रये । दद्दा बऊ की सुने ने भईया साकें (शौक) को मरे जा रये । खब्बीसा सी कटिंग कराये , जोंकरों सी सकल बना रये । लुगईयों से बाल रखायें,  कानों में बाली पेर रये  बाई चारी जींस और स्कीन टच उन्ना पेर रई लाज शर्म तो बची नईया, सडकों पे गर्रा रई । ऐसे ऐसे गाना चले हे , समक्षई मे नई आ रये । दद्दा बऊ की सुने ने भईया साकें (शौक) को मरे जा रये । कृष्णभूषण सिंह चन्देल M.9926436304

जो हे भईया नओ जमानों

 जो हे भईया नओं जमानों सिगरट ऊगरियों मे दबी  मों में गुटखा खाँ रये  पेले भईया मोटर साइकिल को फटफट केत हते , अब तो टू व्हीलर, बाईक  और कुजाने का का केरये ।  जो हे भईया नओ जमानों । पेले भईया कार को ,मोटर केत हते , अब तो फोर व्हीलर और कुजाने का का केरय ।  जो हे भईया नओ जमानों पेले भईया फटो पेन्ट कोऊ ने पेरत तो, अब तो निपकत सो फटो पेन्ट पेर रये  खब्बीसा सी कटिंग कराये,मो मे राजश्री दबाये ,  जो हे भईया नओ जमानों, अब सुन लो मतारी की, तो पेले भईया मतारी को ,माँ केत हते , अब तो मोम, मम्मी और कुजाने का का केरये ।  जो हे भईया नओ जमानों । पेले भईया पंगत होत हती , अब तो बफिंग, डिनर,लंच होत हे , गिद्ध से टूट परत हे सबरे, बेशर्मी से खुदाई उठा उठा खा रये ।  जो हे भईया नओं जमानों । पेले शान्ति से पंगत सबरे जेत हते , अब तो लूटा मारी सी हो रई । पेले सी ने पंगत रई, ने पेले सो प्यार , परसईया प्यार से केत हते, कक्का एक लुचई ओर, हाथ फैलाये कक्का केरये,भईया अब नई परसईया के रऔ, कक्का एक तो चल है कोरी हे मुर जे हे।  जो हे भईया नओ जमानों पेले भईया फिलम को,सि...

सुनों सुनों ऐ इंसानों ,ब्याने कब्रिस्तान के ,

 सुनों सुनों ऐ इंसानों ,ब्याने कब्रिस्तान के , मेरे सन्नाटे, इस बीराने में,एक ख़ामोश आवाज है । कब्र की लिखीं इबारतें, तुम पढ लोगे इंसानों , पर क्या तुम मेरी ख़ामोश आवाज़ को सुन सकते हो  कब्र मे दफ़न हर कंकाल,कभी जिन्दा इंसान हुआ करते थे  आज ख़ामोश कब्र मे दफन इंसानी कंकाल है । इस वीराने मे देखों कितने ख़ामोश है । यहाँ न कोई अपना पराया ,ना मजहपों की दीवार है । दुनिया के शोर शराबे से ,इस सन्नाटे मे सकून से लेटे , व़ासिदे कब्रिस्तान है । मै सन्नाटा हूँ व़ीरान हूँ ख़ामोश हूँ इसीलिये इंसानी बस्तीयाँ आबाद है । मै बदल गया तो सारी दुनिया शमशान होगी , मुर्दों को दफनाने दो ग़ज ज़मीन भी नशीब न होगी. मेरी कब्र,मेरे सन्नाटे मेरी बीरानीयों से , तुम ख़ौप खाते हो,यहाँ आना भी तुम्हे ग़वारा नही मै वीरान हूँ,सुनसान हूँ ,इंसानी कब्रेस्तान हूँ । सुनों सुनों ऐ इंसानों ,ब्याने कब्रिस्तान के , इंतकाल के बाद म़ुर्दो,तुम जाओगें कहाँ , ख़ाक ए सुपुर्द करने,तेरे अपने ही यहाँ आयेंगे आ़खिर दफ़नाये तो यही जाओंगे । सुनों सुनों ऐ इंसानों ,ब्याने कब्रिस्तान के , जीते जी तुम्हे सकुन न था, मेरे अ़गोश मे देखो,कितना सकून ह...

तुम बनों राम, तो मै रावण बन जाता हूँ

 तुम  बनों राम,तो मै रावण बन जाता हूँ । तुम मर्यादा का पाठ पठाओं , माता के कहने पर , वनवास चले जाओं भरत सा भाई तुम्हारा हो , भाई की खडाऊं को गद्दी मे रख , जो स्वयम सेवक जो कहलाता है । तुम  बनो रामपाल,तो मै रावण बन जाता हूँ । मृत्युलोक में ,भगवान ने लीला रचाने , लिया जब राम आवतार , राम का दुश्मन बनने कोई नही था तैयार , तब उस दशानन ज्ञानी ध्यानी ने , खलनायक का आमंत्रण स्वीकार किया , राम के हाथों ,मरने का स्वभाग्य स्वीकार किया , रावण जैसा महाज्ञानी क्या ये नही जानता था तीनो लोकों के स्वामी से युद्ध जीत नही सकता , प्रभु हाथों से मृत्यु मिले , यही कामना थी उसकी ,

रचना संसार

रचना संसार की भीड़ से, मै गुजरात गया रचनाकारों की कलम से निकलती , धूँप छाँओं से रंगें शब्दों में वो तसवीरें थी , जिसमें सावन भादों सी मिठास थी ।  कहीं खुशी के मेले ,कहीं गमों का शोर था  । रचनाओं के विचार ,शब्दों के उधेड बुन , की बातें निराली थी । जो कहती थी , ठहर जा, ये रचना संसार , की जादुई नगरी है । आया तो तू अपनी मर्जी से, मगर जायेगा मेरी मर्जी से । ठहर जा, देख मेरे शब्दों के संसार में, तूझे यहाँ खुशीयाँ और गम ही नही, चल के देख तो मेरे साथ । किसी मोड पर तुझें राम और रहीम मिलेंगे , किसी निरजन सूने ख़ामोंशियों में , कब्रिस्तान और मरघट भी मिलेंगे।  कहीं किसी की डोली उठेगी, कहीं अर्थियों के बोझ मिलेंगे । मै रचना संसार हूँ । खामोश हूँ, पर निःशब्द नही, मेरी कलम की ताकतों से सत्तायें बदल जाती है । इतिहास गवाह है, मेरे शब्दों की ताकत से, खूबसूरत दुनिया की तसवीर को अपने अंदाज मे कह रही थी । ये वो रचना संसार है । रचना संसार की भीड़ से, मै गुजरात गया । रचनाकारों की कलम से निकलती , धूँप छाँओं से रंगें शब्दों में वो तसवीरें थी । जो कह रही थी मै ख़ामोश हूँ निःशब्द नही , मै वो रचना संसार...

ज़िंदा हूँ इस तरह कि ग़म-ए-ज़िन्दगी नहीं

  ज़िंदा हूँ इस तरह - Zinda Hoon Is Tarah (Mukesh, Aag) Movie/Album: आग (1948) Music By: राम गांगुली Lyrics By: बहज़ाद लखनवी Performed By: मुकेश ज़िंदा हूँ इस तरह कि ग़म-ए-ज़िन्दगी नहीं जलता हुआ दीया हूँ मगर रोशनी नहीं ज़िंदा हूँ इस तरह... वो मुद्दतें हुईं हैं किसी से जुदा हुए लेकिन ये दिल की आग अभी तक बुझी नहीं ज़िंदा हूँ इस तरह... आने को आ चुका था किनारा भी सामने ख़ुद उसके पास ही मेरी नैया गई नहीं ज़िन्दा हूँ इस तरह... होंठों के पास आए हँसी, क्या मजाल है दिल का मुआमला है कोई दिल्लगी नहीं ज़िन्दा हूँ इस तरह... ये चाँद ये हवा ये फ़ज़ा, सब हैं माज़मा जब तू नहीं तो इन में कोई दिलकशी नहीं ज़िन्दा हूँ इस तरह... Labels:  1940s  ,  1948  ,  Aag  ,  Behzad Lakhnavi  ,

ये दिल और उनकी, निगाहों के साये

  ये दिल और उनकी, निगाहों के साये - (३) फिल्म प्रेम पर्वत 1973 गीतकार ज़ा निसार अख़्तर मुझे घेर लेते, हैं बाहों के साये - (२) पहाड़ों को चंचल, किरन चूमती है - (२) हवा हर नदी का बदन चूमती है - (२) यहाँ से वहाँ तक, हैं चाहों के साये - (२) ये दिल और उनकी निगाहों के साये ... लिपटते ये पेड़ों से, बादल घनेरे - (२) ये पल पल उजाले, ये पल पल अंधेरे - (२) बहुत ठंडे ठंडे, हैं राहों के साये - (२) ये दिल और उनकी निगाहों के साये ... धड़कते हैं दिल कितनी, आज़ादियों से - (२) बहुत मिलते जुलते, हैं इन वादियों से - (२) मुहब्बत की रंगीं पनाहों के साये - (२) ये दिल और उनकी निगाहों के साये ...

ऐ जि़न्दगी ले चल मुझे वहाँ

 ऐ जि़न्दगी ले चल मुझे वहाँ  जहाँ नफरतों की दिवारे न हो  इंसान का इंसान से इंसानियत का नाता हो हर सुबह मस्जिद मे आज़ान हो चर्चो में धंटों की आवाज  , मंदिर मे शंख नांद हो गुरुद्वारे गुरू वाणी हो ।  ऐ जि़न्दगी ले चल मुझे वहाँ  जहाँ नफरतों की दिवारे न हो  जहाँ हर दिलों मे इंंसानियत के ज़ज्बे आम हो । जहाँ हर मज़हप की  शान में श्रृद्दा से सर क्षुकते हो ।  ऐ जि़न्दगी ले चल मुझे वहाँ  जहाँ नफरतों की दिवारे न हो  जहाँ अमन चैन की बाते हो जहाँ इंसान इंंसानियत के खून का प्यासा न हो जहाँ इंसानी व़ासिन्दों की नफ़रती तासीर ना हो  ऐ जि़न्दगी ले चल मुझे वहाँ, जहाँ नफरतों की दिवारे न हो  जहाँ हर इंसानों की प्यास बुक्षाये बहती ऐसी गंगा धारा हो । जहाँ हिंदू ,मुस्लिम ,सिख, इसाई गंगा जमनी तहज़ीब की पहचान हो ।  ऐ जि़न्दगी ले चल मुझे वहाँ  जहाँ नफरतों की दिवारे न हो । सारे जहाँ मे हम अमन चैन की एक मिसाल हो   जहाँ मुल्क के हर बासिन्दों के सर देश की शान मे कटने को तैयार हो । जहाँ राम की रामायण हो प्रभु इशू की पवित्र बाईबल हो  अ...

बेखौप जिन्दगी चलती रही ।

बेखौप जिन्दगी चलती रही । कभी खुशी,कभी गम की राहो में ।। कभी ठन्ड ने कपाया,कभी गर्मी ने झुलसाया । कितने सावन भादों ,आये चले गये इन राहों में ।। बेखौप जिन्दगी चलती रही । कभी खुशी,कभी गम की राहों में ।। कभी अपने ,कभी पराये । मिलते बिछडते रहे इन राहों मे ।। मै जिन्दगी का आखरी म़ुकाम ढूढता रहा । मललब परस्त, बेरहम इंसानों में ।। बेखौप जिन्दगी चलती रही । कभी खुशी,कभी गम की राहो में ।। आदमी को आदमी न समक्षने वाले । बेलगाम, गुमनाम बस्तीयों मे । मै भूल चुका था, इस मतलपरस्त दुनियां मे ।। मै अकेला आया हूँ ,मुक्षे अकेल जाना है । न मै अपनी मर्जी से यहाँ आया, न अपनी मर्जी से जाना है ।। बेखौप जिन्दगी चलती रही । कभी खुशी,कभी गम की राहो में ।। मै भूल गया जिन्दगी की ज़ुस्तज़ू में, मिट जायेगा जिस्म एक दिन । मेरे अपने ही मुक्षे  सुपूर्द ए ख़ाक कर , वापिस लौट जायेगें अपनी दुनियां मे ।। बेखौप जिन्दगी चलती रही । कभी खुशी,कभी गम की राहो में ।। डाँ. कृष्णभूषण सिंह चन्देल मो.9926436304

बरस बरस को, आज पावनी आयो है त्‍यौहार

  कृष्‍ण -       बरस बरस को , आज पावनी,आयो है त्‍यौहार ।          हमे खेलन दे फॉग गुलाल ।।          रंगी री धरती , रंगो आकाश , रंगो आज सारो संसार ।           हमे खेलन दे फॉग गुलाल ।। राधा-    हम न खेलब , होरी हो तुम संग ,          ऐ गिरधर गोपाल , हमका जाये दे रे नन्‍द लाल । कृष्‍ण    -काहे रिसानी ओ राधे रानी ,         बरस बरस को त्‍यौहार ,       खेलों हमसे फाग गुलाल । राधा-    पतली चुनरीयॉ , मोरी बाली उमरियाँ       तोहें ,काहे लाज शरम न आये ,      हमका जाये दे रे नन्‍द लाल ।   कृष्‍ण – लाज की मारी, ओ राधे रानी,       आज नही कछु लाज ।        हमका खेले दे फाग गुलाल ।     देखो कैसो मगन भयो ह...

बीत गये है सोलह सावन

    बीत गये है, सोलह सावन। परहूं तुम न आये सजनवा ।। बिरहा की आग में। जले रे ,मोरा मनवा ।। पीर न जाने काऊ ।   बीत गये है ,सोलह सावन। परहूं तुम न आये सजनवा ।। सखी सहेली ताना मारे । पुरवाई देत उल्‍हाना ।। सांझ बेला , सब के नैना । देखत मोरे अंगनवा ।।   बीत गये है , सोलह सावन। परहूं तुम न आये सजनवा ।। अमुआ पे बैठी काली कोयलीयॉ , कूंक कूंक के पूछे मोरी विथा । साजनी तोरे साजन की ,आई कोऊ खबरीयाँ ।।   बीत गये है, सोलह सावन। परहूं तुम न आये सजनवा ।। सांझ बेला मोरे अगनवा, रोज देखे बैरी चदनवा, काहे नही आये तुम सजनवा ।   बीत गये है सोलह सावन। परहूं तुम न आये सजनवा ।। भेजत काहे नाही कोऊ खबरिया, मोरे बाबुल भये मोरे दुश्‍मन, ममता ने आंसु सुखोयें , सब जग बैरी भओं सजनवा,   बीत गये है, सोलह सावन। परहूं तुम न आये सजनवा ।। चहुं ओर मोरे लाज के पहरें काहे न समक्षे, जग मोरी पीडा, मै बाबरी तोरे प्‍यार में पागल, और तू बैरी न समझे मोरी पीडा ।   बीत गये है सोलह सावन, परहूं तुम न आये सजनवा ।। जबहुं देखू मै ...

काहे क्षूठी शान पे अकडे

 काहे क्षूठी ,शान पे अकडे , किस वहम मे खोया रे । भूल गया ये जग दो दिन का मेला रे । सारी दुनिया मे हूकूमत , तो कर सका ना सिकन्दर भी। न जुल्म का क्षण्डा फहरा सका चंगेज भी । आये मुसाफिर चले गये  कल भी कोई सिकंदर होगा  फिर कोई जुल्मे चंगेज आयेगा  ये दुनिया रैनबसेरा है । आया है ,तो जायेगा । ना तू आखरी इंसान है , तेरे पहले भी हुऐ है , इस तक्तों ताज के वा़रिश, तेरे बाद भी होगें, इंसानी कारनामों के किस्से, काहे क्षूठी शान पे अकडें किस वहम मे खोया रे । कोई नही यहाँ तेरा अपना, कुछ नही है ,यहाँ तेरा रे , मुसाफिरों की इस भीड़ मे, तू ही नही अकेला रे । मर्यादा का पाठ पढाने, आये थे ,भगवान श्रीराम भी , अज़र अमर न रावण रहा, न रहे भगवान भी, सभी आये इस भीड में, पर न जाने कहाँ खो गये । काहे क्षूठी शान पे अकडे , किस वहम में खोया रे । होगें तेरे कारनामें ,काबिले तारीफ, इतिहास ऐ तारीख मे फिर याद किये जायेगें, काहे क्षूठी शान पे अकडे , किस वहम मे खोया रे । डाँ. कृष्णभूषण सिंह चन्देल मो.न. 9926436304

आओं हम सब मिल कर

                          आओं हम सब मिल कर  आओं हम सब मिल कर , एक नया हिन्दुस्तान बनायें । जहाँ मज़हपों के नाम नफरतें न हो । जात पात ऊँच नीच की दीवारें न हों । मंदिर मे शंख नाद , मस्जिद में आजान हो,  गुरुद्वारें  गुरुवाणी ,चर्चों में घंटों की अवाज हो, आओं हम सब मिल कर , एक नया हिन्दूस्तान बनाये, मज़हपों के नाम पर, जों नफ़रते फैलाते । बन हम हिन्द की ताकत, सबको अमन चैन का पाठ पढ पढायें, आओं हम सब मिल कर , एक नया हिन्दुस्तान बनायें। जहाँ राम हो , रहीम हो ,सिख हों , ईसाई हो , भाई से भाई चारा हो , जहाँ नफरतों की कोई जगह न हो । आओं हम सब मिल कर ,  एक नया हिन्दुस्तान बनायें , तोड दो उन दिवारों को , जहाँ से नफ़रत की बूँ आये । चैन अमन की खुशबू हो जहाँ , हम ऐसा एक मुल्क बनायें । दुनिया की जंगी,नफरती अबो़ं हवा से दूर, एक सुनहरा, भारत बनायें , आओं हम सब मिल कर , एक नया हिन्दुस्तान बनायें । डाँ. कृष्णभूषण सिह चन्देल मो. 9926436304